राहु काल
आज · बुधवार, 9 सितंबर 2026
हर दिन की करीब नब्बे मिनट की अशुभ अवधि, जो वार और आपके स्थानीय सूर्योदय से तय होती है — कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य आरंभ करने से पहले अपने शहर का आज का राहु काल देखें।
राहु काल
यहाँ आज पंचांग के समय खंड परिभाषित नहीं हैं
चोघड़िया, गौरी एवं राहु काल — सभी स्थानीय दिन-प्रकाश को आठ बराबर भागों में विभाजित करते हैं। बहुत उच्च अक्षांश (~66° से ऊपर) पर सूर्य दिन-भर डूबे या उगे रह सकता है, अतः इस तिथि के लिए स्थानीय सूर्योदय/सूर्यास्त की जोड़ी उपलब्ध नहीं है। ऊपर दी गई तिथि, नक्षत्र एवं योग की गणना यथावत मान्य है।
दिन के छह सबसे महत्त्वपूर्ण मुहूर्तों का संक्षिप्त संग्रह — तीन शुभ (ब्रह्म, अभिजित, अमृत) और तीन अशुभ (राहु, यमगण्ड, गुलिक)। कुछ दिनों पर एक अवधि की गणना संभव न होने पर कम भी दिख सकते हैं।
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कृष्ण त्रयोदशी · बुध
10:59:26
| 04:31→05:17 | ||
| 13:43→15:13 | ||
| 12:18→13:52 | ||
| 07:36→09:10 | ||
| 10:44→12:18 | ||
| 04:41→06:11 |
लाहिरी अयनांश और दृक् गणित (वास्तविक स्थिति) पद्धति से गणना।
अशुभ समय — इनसे बचें
आपके स्थान के लिए अगले सात दिनों में से हर दिन परंपरागत रूप से नए आरंभ से मुक्त रखी जाने वाली चार अवधियाँ — राहु काल, यमगंड और गुलिक (दिन के उजाले के बराबर आठवें भाग) तथा चंद्रमा-आधारित वर्ज्यम्।
| तिथि | राहु कालसबसे अधिक टाला जाने वाला | यमगण्ड कालयम की अवधि | गुलिक कालटालने योग्य सबसे कोमल | वर्ज्यम्नक्षत्र का त्याज्य भाग |
|---|---|---|---|---|
| बुध, 9 सित॰ | 12:18 – 13:52 | 07:36 – 09:10 | 10:44 – 12:18 | 04:41 – 06:11 |
| गुरु, 10 सित॰ | 13:51 – 15:25 | 06:03 – 07:37 | 09:10 – 10:44 | 02:38 – 04:10 |
| शुक्र, 11 सित॰ | 10:44 – 12:17 | 15:24 – 16:57 | 07:37 – 09:10 | 21:47 – 23:20 |
| शनि, 12 सित॰ | 09:10 – 10:44 | 13:50 – 15:23 | 06:04 – 07:37 | 20:21 – 21:55 |
| रवि, 13 सित॰ | 16:55 – 18:28 | 12:16 – 13:49 | 15:22 – 16:55 | 21:22 – 22:59 |
| सोम, 14 सित॰ | 07:38 – 09:11 | 10:43 – 12:16 | 13:49 – 15:22 | 21:22 – 23:01 |
| मंगल, 15 सित॰ | 15:21 – 16:53 | 09:11 – 10:43 | 12:16 – 13:48 | 19:50 – 21:32 |
शुभ समय — इन्हें प्राथमिकता दें
आपके स्थान के लिए अगले सात दिनों में से हर दिन की तीन सबसे शुभ अवधियाँ — भोर से पहले ब्रह्म मुहूर्त, मध्याह्न में अभिजित, और चंद्रमा-आधारित अमृत काल। पूजा, अध्ययन व नए आरंभ के लिए उत्तम।
| तिथि | ब्रह्म मुहूर्तप्रातःकाल, सर्वाधिक पवित्र | अभिजित मुहूर्तमध्याह्न की विजय-घड़ी | अमृत कालअमृत-तुल्य घड़ी |
|---|---|---|---|
| बुध, 9 सित॰ | 04:31 – 05:17 | — | 13:43 – 15:13 |
| गुरु, 10 सित॰ | 04:31 – 05:17 | 11:53 – 12:42 | 11:46 – 13:18 |
| शुक्र, 11 सित॰ | 04:31 – 05:17 | 11:52 – 12:42 | 07:04 – 08:37 |
| शनि, 12 सित॰ | 04:32 – 05:18 | 11:52 – 12:42 | 05:48 – 07:23 |
| रवि, 13 सित॰ | 04:32 – 05:18 | 11:52 – 12:41 | 07:03 – 08:40 |
| सोम, 14 सित॰ | 04:32 – 05:19 | 11:51 – 12:41 | 07:17 – 08:56 |
| मंगल, 15 सित॰ | 04:32 – 05:19 | 11:51 – 12:40 | 06:00 – 07:42 |
राहु काल, यमगंड और गुलिक दिन के उजाले के बराबर आठवें भाग हैं जो सूर्योदय व सूर्यास्त के साथ बदलते हैं। ब्रह्म और अभिजित दिन की गोधूलि व मध्याह्न के अनुसार चलते हैं। अमृत काल और वर्ज्यम् चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करते हैं, इसलिए वे रात में पड़ सकते हैं या किसी दिन बिल्कुल न हों — ऐसे खानों में डैश दिखता है।
हर अवधि का अर्थ
ऊपर डायल पर चिह्नित हर अवधि की संक्षिप्त मार्गदर्शिका — कौन-सी शुभ हैं, किन्हें टालना है, और हर एक परंपरागत रूप से किसके लिए है।
| अवधि | प्रकार | किसके लिए |
|---|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | शुभ | प्रातः ध्यान व स्वाध्याय का समय |
| अभिजित मुहूर्त | शुभ | किसी भी नए कार्य का शुभ मध्याह्न |
| अमृत काल | शुभ | नए आरंभ हेतु आज का सर्वोत्तम समय |
| राहु काल | टालें | नया कार्य या यात्रा शुरू न करें |
| यमगण्ड काल | टालें | बड़े निर्णय व हस्ताक्षर टालें |
| गुलिक काल | टालें | नए काम व वादे टालें |
| वर्ज्यम् | टालें | महत्त्वपूर्ण कार्य टालें |
राहु काल क्या है?
राहु काल — जिसे राहु कालम भी कहते हैं — हर दिन की करीब नब्बे मिनट की एक अवधि है जिसे वैदिक परंपरा कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य आरंभ करने के लिए अशुभ मानती है। इसका नाम राहु से है, उत्तरी छाया-ग्रह से, जिसका प्रभाव निर्णय को धुँधला करने और नए आरंभ को बिगाड़ने वाला माना जाता है। चौघड़िया की तरह इसमें कुंडली की ज़रूरत नहीं: यह पूरी तरह दिन के सूर्योदय, सूर्यास्त और वार से पढ़ा जाता है। अधिकांश लोग कोई सौदा करने, यात्रा पर निकलने, संस्कार करने या महत्त्वपूर्ण ख़रीद से पहले इस अवधि के बीतने की प्रतीक्षा करते हैं और उसके बाद कार्य शुरू करते हैं।
वैदिक ज्योतिष में राहु काल का महत्त्व
दिन की सभी अशुभ अवधियों में राहु काल भारत भर में सबसे अधिक माना जाने वाला है — विवाह, गृहप्रवेश, नए कार्य, यात्रा और बड़ी ख़रीद से पहले इसे देखा जाता है। इसका कारण ज्योतिषीय जितना है उतना व्यावहारिक भी: एक सरल, आसानी से याद रहने वाली अवधि जिसे कोई भी बिना ज्योतिषी के टाल सकता है, किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को प्रतिकूल समय से बचाए रखती है।
राहु काल के साथ दो सहयोगी अवधियाँ हैं — यमगंड और गुलिक काल — जिन्हें वार और सूर्योदय से इसी तरह पढ़ा जाता है। तीनों में राहु काल सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है, इसीलिए इसका अपना पृष्ठ है और सबसे पहले इसी को देखने की परंपरा है।
राहु काल की गणना कैसे होती है
राहु काल केवल दिन के उजाले से बनता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और उनमें से एक भाग — वार से तय — राहु काल होता है। चूँकि दिन की लंबाई साल भर और हर स्थान पर बदलती है, हर भाग ठीक नब्बे मिनट का कम ही होता है, और राहु काल का घड़ी-समय आपके शहर के सूर्योदय और ऋतु के साथ बदलता है।
आठ में से कौन-सा भाग राहु काल है, यह केवल वार पर निर्भर करता है। यह सूर्योदय के बाद के पहले भाग में कभी नहीं पड़ता। सोमवार दूसरा भाग लेता है, शनिवार तीसरा, शुक्रवार चौथा, बुधवार पाँचवाँ, गुरुवार छठा, मंगलवार सातवाँ और रविवार आठवाँ व अंतिम। इसीलिए जैसे ही आप अपना शहर बदलते हैं या किसी अन्य तिथि पर जाते हैं, यह पृष्ठ अवधि — और सूर्य व चंद्र समय — पुनः गणना करता है।
वार के अनुसार राहु काल
हर वार पर राहु काल दिन के आठ बराबर भागों में से किस भाग में पड़ता है। सटीक घड़ी-समय फिर भी आपके स्थान के सूर्योदय व सूर्यास्त पर निर्भर करता है।
| वार | दिन के उजाले का राहु काल भाग |
|---|---|
| रवि | आठवाँ |
| सोम | दूसरा |
| मंगल | सातवाँ |
| बुध | पाँचवाँ |
| गुरु | छठा |
| शुक्र | चौथा |
| शनि | तीसरा |
भाग सूर्योदय से गिने जाते हैं। सूर्योदय के बाद का पहला भाग कभी राहु काल नहीं होता।
राहु काल में कुछ कार्य क्यों टाले जाते हैं
राहु भ्रम, माया और अचानक उलटफेर का सूचक है, इसलिए परंपरा मानती है कि इसकी अवधि में आरंभ किया गया कोई भी कार्य एक छाया लिए रहता है — ऐसे परिणाम जो निराश करें, अटक जाएँ या बिखर जाएँ। इसलिए यह अवधि उसी के लिए रखी जाती है जो पहले से चल रहा हो या पूरी तरह सामान्य हो, और नए संकल्पों व अपरिवर्तनीय क़दमों से मुक्त रखी जाती है।
यह सावधानी आरंभ को लेकर है, चलते जीवन को लेकर नहीं। राहु काल पहले से चल रहे कार्य, दैनिक काम या किसी अत्यावश्यक व अपरिहार्य कार्य को नहीं रोकता; यह केवल यह कहता है कि उस अवधि में कुछ नया और टिकाऊ शुरू न करें।
राहु काल में पारंपरिक रूप से टाले जाने वाले कार्य
ये वे नए आरंभ और महत्त्वपूर्ण कार्य हैं जिन्हें अधिकांश लोग राहु काल बीतने तक रोक रखते हैं:
- नया व्यापार, उद्यम या नौकरी आरंभ करना
- विवाह, सगाई और अन्य संस्कार
- यात्रा या लंबे सफ़र पर निकलना
- संपत्ति, वाहन, स्वर्ण या अन्य बड़ी ख़रीद
- अनुबंध, समझौते या वित्तीय सौदों पर हस्ताक्षर
- गृहप्रवेश और नींव रखना
- शिक्षा, प्रशिक्षण या किसी महत्त्वपूर्ण पहले पाठ का आरंभ
राहु काल में किए जा सकने वाले कार्य
राहु काल नए आरंभ को रोकता है, जीवन को नहीं। ये सामान्यतः उचित माने जाते हैं:
- दैनिक दिनचर्या, पहले से चल रहा कार्य और चलते कर्तव्य
- अत्यावश्यक, अपरिहार्य या आपातकालीन कार्य
- पूजा, प्रार्थना, जप और राहु-संबंधी उपाय
- रोज़ की जाने वाली सामान्य यात्रा, जैसे नित्य का आना-जाना
- पहले से चल रहा अध्ययन, अभ्यास और दोहराव
- भोजन, विश्राम और सामान्य घरेलू कार्य
महत्त्वपूर्ण आयोजनों से पहले राहु काल देखने का महत्त्व
विवाह, गृहप्रवेश, नए उद्यम और अन्य पड़ावों के लिए एक शुभ मुहूर्त चुना जाता है — और एक प्रमुख कसौटी यह है कि वह राहु काल से न टकराए। एक प्रबल चौघड़िया या अच्छी होरा भी प्रायः छोड़ दी जाती है यदि वह राहु काल के भीतर पड़े, क्योंकि उस अवधि की छाया शुभ अवधि पर भारी मानी जाती है।
जाँचने में बस एक क्षण लगता है: अपने शहर का आज का राहु काल देखें, फिर उससे बाहर का समय चुनें। चूँकि यह अवधि आपके स्थान और तिथि के साथ बदलती है, सबसे सुरक्षित आदत यह है कि आयोजन के ठीक दिन और स्थान के लिए इसे ताज़ा देखें, न कि किसी याद किए हुए समय पर भरोसा करें।
राहु काल, यमगंड और गुलिक काल
राहु काल दिन की तीन अशुभ अवधियों में से एक है, जिन्हें वार और सूर्योदय से एक ही तरह पढ़ा जाता है। यमगंड काल, यम से जुड़ा, इसी तरह नए कार्य के लिए टाला जाता है; गुलिक काल, शनि-पुत्र गुलिक से जुड़ा, तीनों में सबसे कोमल है और कुछ विशेष कार्यों के लिए सहायक तक माना जाता है। ऊपर की डायल इन सबको चिह्नित करती है, साथ ही शुभ ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित मुहूर्त और अमृत काल को भी, ताकि एक नज़र में दिखे कि दिन के कौन-से भाग अनुकूल हैं और किन्हें छोड़ देना चाहिए।
अधिक पूरी तस्वीर के लिए उस दिन का पूरा पंचांग देखें, चौघड़िया अवधियों की तुलना करें, या शुभ मुहूर्त मार्गदर्शिका से कोई स्पष्ट समय चुनें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- राहु काल क्या है और इसे अशुभ क्यों माना जाता है?
- राहु काल हर दिन की करीब नब्बे मिनट की अवधि है, जो वार से तय होती है, और जिसे वैदिक परंपरा कोई महत्त्वपूर्ण कार्य आरंभ करने के लिए अशुभ मानती है। इसका नाम राहु से है — वह छाया-ग्रह जो भ्रम और उलटफेर से जुड़ा है — इसलिए नए आरंभ प्रायः इस अवधि के बीतने तक रोक रखे जाते हैं।
- राहु काल की गणना कैसे होती है?
- सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिन को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और एक भाग — वार से तय — राहु काल होता है। यह सूर्योदय के बाद का पहला भाग कभी नहीं होता: सोमवार दूसरा भाग, शनिवार तीसरा, शुक्रवार चौथा, बुधवार पाँचवाँ, गुरुवार छठा, मंगलवार सातवाँ और रविवार आठवाँ। दिन की लंबाई बदलने के कारण सटीक घड़ी-समय आपके स्थान और तिथि के साथ बदलता है।
- शहर बदलने पर राहु काल क्यों बदल जाता है?
- राहु काल स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त पर आधारित होता है, जो हर स्थान पर भिन्न होते हैं। जब आप दूसरा शहर चुनते हैं तो पृष्ठ उस स्थान के लिए राहु काल अवधि — और सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय व चंद्रास्त — पुनः गणना करता है।
- राहु काल में किन कार्यों से बचना चाहिए?
- नए आरंभ और महत्त्वपूर्ण कार्य रोक रखें — नया व्यापार, विवाह, यात्रा, बड़ी ख़रीद, अनुबंध पर हस्ताक्षर, गृहप्रवेश आदि। सामान्य कार्य, पहले से चल रहे काम, अत्यावश्यक मामले, पूजा और उपाय सामान्यतः उचित माने जाते हैं।
- क्या राहु काल में पूजा या उपासना कर सकते हैं?
- हाँ। राहु काल नए, टिकाऊ आरंभ को रोकता है, आध्यात्मिक साधना को नहीं। पूजा, प्रार्थना, जप और राहु-संबंधी उपाय इस अवधि में प्रायः किए जाते हैं और अक्सर विशेष रूप से उपयुक्त माने जाते हैं।
- क्या राहु काल, यमगंड और गुलिक काल एक ही हैं?
- नहीं, पर इन्हें एक ही तरह पढ़ा जाता है। राहु काल, यमगंड और गुलिक काल दिन की तीन अलग-अलग अशुभ अवधियाँ हैं, हर एक वार और स्थानीय सूर्योदय से तय। राहु काल सबसे अधिक माना जाता है; गुलिक काल सबसे कोमल है और कुछ विशेष कार्यों के लिए सहायक तक माना जाता है।

