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उपनयन (जनेऊ) मुहूर्त 2023

जीवन के शुभ आरंभ के लिए मंगलमय तिथियाँ

फ़रवरी 2023

2 शुभ दिन

सो
मं
बु
गु
शु
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28
सर्वोत्तम दिनशुभ

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

सर्वाधिक शुभ

मुहूर्त समय

श्रेष्ठ मुहूर्त09:4311:08
दिन का शुभ मुहूर्त1 घं 26 मि
नक्षत्र
अश्विनी
तिथि
शुक्ल पंचमी
योग
शुक्ल
करण
बव

यह दिन क्यों शुभ

  • अश्विनी — इस संस्कार हेतु शुभ नक्षत्र
  • शुक्ल पंचमी — अनुकूल तिथि
  • सर्वार्थ सिद्धि योग योग सक्रिय — एक अतिरिक्त शुभता
  • अभिजित मुहूर्त — मध्याह्न का 'विजय' काल

वर्जित समय

  • राहु काल11:08–12:34
  • यमगण्ड15:25–16:51
  • गुलिक काल08:17–09:43
  • वर्ज्यम्23:30–01:05
पूरा पंचांग देखें

10 शुभ दिन

2023 में सर्वाधिक शुभ उपनयन तिथियाँ।

फ़रवरी2023

2 शुभ दिन
  1. 10
  2. 24

    शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

    सर्वाधिक शुभ
    शुभ मुहूर्त09:43 – 11:08
    अश्विनीशुक्ल पंचमीसर्वार्थ सिद्धि योगपूरा पंचांग देखें

मार्च2023

2 शुभ दिन
  1. 1

    बुधवार, 1 मार्च 2023

    सर्वाधिक शुभ
    शुभ मुहूर्त06:46 – 08:13
    मृगशिराशुक्ल दशमीसर्वार्थ सिद्धि योगपूरा पंचांग देखें
  2. 10

अप्रैल2023

1 शुभ दिन
  1. 27

    गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

    शुभ
    शुभ मुहूर्त07:23 – 08:49
    पुष्यशुक्ल सप्तमीसर्वार्थ सिद्धि योगपूरा पंचांग देखें

मई2023

3 शुभ दिन
  1. 3

    बुधवार, 3 मई 2023

    शुभ
    शुभ मुहूर्त06:13 – 07:1908:58 – 10:38
    हस्तशुक्ल त्रयोदशीसर्वार्थ सिद्धि योगपूरा पंचांग देखें
  2. 21
  3. 22

    सोमवार, 22 मई 2023

    सर्वाधिक शुभ
    शुभ मुहूर्त05:27 – 07:0908:52 – 10:35
    मृगशिराशुक्ल तृतीयाअमृत सिद्धि योगसर्वार्थ सिद्धि योगपूरा पंचांग देखें

जून2023

2 शुभ दिन
  1. 8
  2. 28

उपनयन (जनेऊ) मुहूर्त के बारे में

उपनयन (जनेऊ या यज्ञोपवीत संस्कार) वह दीक्षा है जिससे बालक का विधिवत अध्ययन आरंभ होता है — बाल संस्कारों में वही एक जिसका समय शास्त्र विवाह जितनी कठोरता से तय करते हैं। परंपरा इसे केवल उत्तरायण में — सूर्य मकर से मिथुन तक — शुभ दिन के पूर्वाह्न में, गुरु व शुक्र दोनों के उदित रहते करने को कहती है। नीचे की प्रत्येक तिथि इन नियमों पर पूर्णतः खरी है, दृक-पंचांग से गणना की गई है, और उसके साथ वास्तविक पूर्वाह्न मुहूर्त दिया गया है।

उपनयन (जनेऊ) मुहूर्त की तिथियाँ कैसे चुनी जाती हैं

  • तिथियाँ उपनयन के तेरह शास्त्रीय नक्षत्रों पर पड़ती हैं — अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण व धनिष्ठा का पंचक-मुक्त पूर्वार्ध — वही समूह जिस पर बी.वी. रमन की 'मुहूर्त' और मुहूर्त चिंतामणि परंपरा एकमत हैं। शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद व रेवती भी शास्त्रीय सूची में हैं, किंतु वे पूर्णतः पंचक-पट्टी के भीतर पड़ते हैं — जो उपनयन में वर्जित है — अतः वे कभी तिथि नहीं बनाते।
  • जनेऊ केवल उत्तरायण में दिया जाता है — सूर्य मकर से मिथुन तक (लगभग मध्य जनवरी से मध्य जुलाई) — जिसमें मीन मास खरमास होने से वर्जित है। शास्त्र माघ से वैशाख तक के महीने बताते हैं, जिनमें वसंत सर्वश्रेष्ठ है।
  • द्वितीया, तृतीया, पंचमी व दशमी 'सर्वाधिक शुभ' स्तर पाती हैं; सप्तमी व त्रयोदशी 'शुभ' स्तर पर। कृष्ण पक्ष में शास्त्र-परंपरा अनुसार केवल द्वितीया, तृतीया व पंचमी ली जाती हैं। अष्टमी, एकादशी व द्वादशी — जिन्हें कुछ आधुनिक सूचियाँ लेती हैं — शास्त्रीय नियम से वर्जित हैं, साथ ही रिक्ता तिथियाँ, अमावस्या व पूर्णिमा।
  • सोम, बुध, गुरु व शुक्र वार श्रेष्ठ हैं; रविवार मध्यम होकर 'शुभ' स्तर पर दिखता है; मंगलवार व शनिवार वर्जित हैं।
  • पंचक उपनयन में वर्जित है, अतः धनिष्ठा-मध्य से रेवती तक की पट्टी हर मुहूर्त में से काट दी जाती है। नौ अशुभ योग, भद्रा (विष्टि करण) व गण्डान्त पद हटाए जाते हैं; कैलेंडर चातुर्मास व अधिक मास में रुकता है; और — विवाह की ही तरह — गुरु या शुक्र के अस्त रहते जनेऊ नहीं होता।
  • उपनयन शास्त्राज्ञा से पूर्वाह्न का संस्कार है, अतः प्रत्येक मुहूर्त सूर्योदय से आरंभ होकर स्थानीय सौर मध्याह्न तक सिमट जाता है। वर्ण-विशेष नियम — जैसे मिथुन का सूर्य कुछ ही समुदायों के अनुकूल होना — व्यक्तिगत हैं; अपने पुरोहित से पुष्टि कराएँ।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • तिथियाँ नई दिल्ली (IST) हेतु गणना की गई हैं। अन्य शहरों में समय थोड़ा बदलता है।
  • पंचांग के पाँचों अंग एक साथ तौले जाते हैं — दिन तभी प्रबल होता है जब शुभ नक्षत्र के साथ शुभ तिथि और सौम्य वार भी हो।
  • अभिजित मुहूर्त — मध्याह्न (सौर दोपहर) के आसपास का ~48 मिनट का समय — सर्वत्र शुभ माना जाता है, और गृह प्रवेश व भूमि पूजन के मुहूर्त में श्रेष्ठ समय के रूप में दर्शाया गया है।
  • राहु काल, यमगण्ड व गुलिक काल दैनिक अशुभ अवधियाँ हैं; सूचीबद्ध तिथि पर भी वास्तविक कार्य इनसे बाहर आरंभ करें।
  • खरमास / मलमास — जब सूर्य धनु (मध्य दिसंबर→मध्य जनवरी) या मीन (मध्य मार्च→मध्य अप्रैल) में रहता है — विवाह व बड़े शुभ कार्य रुक जाते हैं।
  • चातुर्मास — देवशयनी से प्रबोधिनी एकादशी तक — विवाह, गृह प्रवेश व कई संस्कार स्थगित रहते हैं।
  • अधिक मास (मलमास) में शुभ कार्य परंपरागत रूप से स्थगित रहते हैं, अतः कुछ महीनों में बहुत कम या कोई तिथि नहीं दिखती।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उपनयन की तिथियाँ केवल जनवरी से जुलाई के बीच क्यों हैं?
शास्त्र जनेऊ केवल उत्तरायण में बताते हैं — सूर्य मकर से मिथुन तक, लगभग मध्य जनवरी से मध्य जुलाई। दक्षिणायन (मध्य जुलाई से मध्य जनवरी) में कोई तिथि नहीं होती, और बीच का मीन मास (मध्य मार्च–मध्य अप्रैल) खरमास होने से वर्जित है।
उपनयन का मुहूर्त सदा सुबह ही क्यों?
उपनयन पूर्वाह्न का संस्कार है — शास्त्राज्ञा इसे दोपहर से पहले करने की है। इसलिए प्रत्येक मुहूर्त सूर्योदय से आरंभ होकर स्थानीय सौर मध्याह्न तक सिमट जाता है; अपराह्न व रात्रि के समय यहाँ कभी नहीं दिखते।
अन्य बाल संस्कारों में पंचक के नक्षत्र हैं — उपनयन में क्यों नहीं?
पंचक उपनयन में वर्जित है — शास्त्र रोग व मृत्यु पंचक का विशेष निषेध करते हैं — अतः धनिष्ठा-मध्य से रेवती तक की पट्टी हर मुहूर्त में से काटी जाती है। शतभिषा, दोनों भाद्रपद व रेवती यहाँ कभी नहीं दिखते, जबकि नामकरण जैसे संस्कार उन्हें रखते हैं।
क्या ये तिथियाँ पुरोहित का विकल्प हैं?
नहीं। कुछ शास्त्रीय नियम व्यक्तिगत हैं और पंचांग-स्तर पर नहीं लग सकते — जैसे पुनर्वसु व मिथुन का सूर्य कुछ ही वर्णों के अनुकूल होना, या ज्येष्ठ पुत्र का उपनयन वृषभ के सूर्य में वर्जित होना — और बालक की कुंडली से तारा-चंद्र बल भी देखा जाता है। अंतिम तिथि अपने पुरोहित से पुष्टि कराएँ।
ये मुहूर्त तिथियाँ कैसे निकाली जाती हैं?
प्रत्येक दिन को उसके दृक-पंचांग के पाँच अंगों — तिथि, वार, नक्षत्र, योग व करण — के आधार पर, मुहूर्त चिंतामणि, कालप्रकाशिका व बी.वी. रमन की 'मुहूर्त' की शास्त्रीय परंपरा अनुसार अंक दिए जाते हैं। फिर दोषयुक्त दिन (अमावस्या, रिक्ता तिथि, भद्रा या पंचक) हटा दिए जाते हैं, और नई दिल्ली हेतु केवल शुभ तिथियाँ शेष रहती हैं।
क्या ये समय मेरे शहर के लिए मान्य हैं?
तिथियाँ नई दिल्ली (IST) पर आधारित हैं। शुभ दिन प्रायः पूरे भारत में समान रहता है, पर सूर्योदय-आधारित समय — तथा राहु काल व अभिजित जैसी अवधियाँ — स्थान अनुसार थोड़ा बदलते हैं, अतः समय तय करने से पूर्व अपने शहर का पूरा पंचांग देखें।
कुछ महीनों में कोई तिथि क्यों नहीं होती?
कठोर नियम अशुभ तिथियों व नक्षत्रों को हटा देते हैं, और ऋतु-विराम — खरमास (मलमास), चातुर्मास व अधिक मास — बड़े शुभ कार्यों को पूर्णतः रोक देते हैं। इन अवधियों में पड़ने वाले महीने में कम या कोई तिथि न दिखना स्वाभाविक है।
अभिजित मुहूर्त क्या है?
अभिजित स्थानीय मध्याह्न (सौर दोपहर) के आसपास का लगभग 48 मिनट का समय है, जिसके स्वामी भगवान विष्णु हैं और जो लगभग हर कार्य हेतु शुभ माना जाता है। मुहूर्त ग्रंथ इसे 'विजय' काल मानते हैं, और हम इसे गृह प्रवेश व भूमि पूजन के मुहूर्त में श्रेष्ठ समय के रूप में दर्शाते हैं।
भद्रा, पंचक व रिक्ता तिथि क्या हैं?
ये वे शास्त्रीय दोष हैं जिन्हें हम हटाते हैं। भद्रा (विष्टि करण) व पंचक (अंतिम पाँच नक्षत्रों — धनिष्ठा से रेवती — में चंद्रमा) अशुभ अवधियाँ हैं; रिक्ता तिथियाँ — प्रत्येक पक्ष की चतुर्थी, नवमी व चतुर्दशी — नए आरंभ हेतु वर्जित 'रिक्त' तिथियाँ हैं।
क्या फिर भी ज्योतिषी से परामर्श करना चाहिए?
हाँ। ये तिथियाँ शास्त्रीय नियमों पर आधारित एक सशक्त सूची हैं, पर ये एक सामान्य कुंडली हेतु निकाली गई हैं। विवाह या किसी बड़े आयोजन हेतु अपनी जन्मकुंडली से मुहूर्त का मिलान कर ज्योतिषी से पुष्टि करना उचित है।